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राजस्थान में जल संकट समस्याएं एवं सुझाव का भौगोलिक अवलोकन
Authors
PREM SHANKAR KIRAR
Abstract
राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है, जिसकी भौगोलिक संरचना और जलवायु इसे जल संकट की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बनाती है। राज्य का एक बड़ा हिस्सा थार मरुस्थल के अंतर्गत आता है, जहाँ औसत वार्षिक वर्षा अत्यधिक असमान और सीमित होती है। वर्षा का यह असमान वितरण राजस्थान के पूर्वी और पश्चिमी भागों में जल संसाधनों की उपलब्धता में बड़ा अंतर पैदा करता है। पूर्वी राजस्थान में जहाँ चंबल जैसी स्थायी नदियाँ बहती हैं, वहीं पश्चिमी राजस्थान में लूनी जैसी मौसमी नदियों पर निर्भरता अधिक है। जल संकट राजस्थान की प्रमुख समस्याओं में से एक है, जो राज्य की कृषि, पेयजल आपूर्ति, औद्योगिक विकास और पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। अत्यधिक जल दोहन और पारंपरिक जल स्रोतों की उपेक्षा के कारण यह समस्या और भी विकट हो गई है। जल संकट केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के बढ़ते प्रभाव के कारण शहरों में भी स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन चुकी है।
जलवायु परिवर्तन भी राजस्थान के जल संकट को और जटिल बना रहा है। लगातार बढ़ते तापमान, अनियमित मानसून, और भूजल स्तर में गिरावट के कारण जल संसाधनों की उपलब्धता लगातार घट रही है। वहीं, जनसंख्या वृद्धि और जल की बढ़ती मांग ने समस्या को और अधिक गहरा बना दिया है। जल की इस विकट स्थिति का प्रभाव न केवल मानव जीवन पर पड़ता है, बल्कि पशुपालन, जैव विविधता, वनस्पति और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ता है।
इतिहास गवाह है कि राजस्थान के लोगों ने जल संरक्षण और प्रबंधन के लिए पारंपरिक तरीकों का व्यापक रूप से उपयोग किया है। जल संचयन के लिए बावड़ी, टांका, जोहड़, नाड़ी और कुंड जैसी संरचनाएँ यहाँ की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर रही हैं। हालाँकि, आधुनिक विकास के दौर में इन पारंपरिक जल संरचनाओं की उपेक्षा की गई, जिससे राज्य की जल उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
इस शोध पत्र में राजस्थान के जल संकट का भौगोलिक परिप्रेक्ष्य से गहन विश्लेषण किया गया है। इसमें जल संसाधनों की वर्तमान स्थिति, जल संकट के कारणों, इसके प्रभावों और संभावित समाधानों पर चर्चा की गई है। साथ ही, जल संरक्षण के परंपरागत और आधुनिक तरीकों का तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया गया है। यह अध्ययन राजस्थान के जल संकट को समझने और इससे निपटने के लिए ठोस नीतिगत सुझाव प्रदान करने में सहायक सिद्ध होगा।
राजस्थान में जल संसाधनों की स्थिति
राजस्थान का भौगोलिक परिदृश्य और शुष्क जलवायु इसे जल संसाधनों की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बनाते हैं। जल संसाधनों की उपलब्धता सीमित है और उनका वितरण असमान रूप से होता है। राज्य का अधिकांश भाग शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु क्षेत्र में आता है, जहाँ प्राकृतिक जल स्रोतों की संख्या कम है और मौजूदा संसाधनों पर बढ़ता दबाव जल संकट को और भी गंभीर बना रहा है। राजस्थान में जल संसाधन मुख्य रूप से भूजल, सरित जल (नदियाँ), झीलें, जलाशय, और वर्षा जल पर आधारित हैं।
1. भूजल संसाधन: राजस्थान में भूजल की उपलब्धता अत्यंत सीमित है और अत्यधिक दोहन के कारण जल स्तर तेजी से गिर रहा है। राज्य के कई जिलों, विशेष रूप से जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, और बीकानेर में भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा चुका है। अत्यधिक दोहन के कारण कई क्षेत्रों में खारा पानी सतह पर आ गया है, जिससे पेयजल और सिंचाई के लिए उपयोग योग्य पानी की मात्रा और भी कम हो गई है।
राजस्थान में भूजल पुनर्भरण की दर भी कम है क्योंकि यहाँ का अधिकांश क्षेत्र कठोर चट्टानों से बना हुआ है, जिससे जल संरक्षण की प्राकृतिक क्षमता सीमित हो जाती है। इसके अतिरिक्त, अनियंत्रित बोरवेल खुदाई और पारंपरिक जल संचयन तकनीकों की उपेक्षा ने स्थिति को और खराब कर दिया है।
2. सरित जल संसाधन (नदियाँ): राजस्थान में नदियों की संख्या अपेक्षाकृत कम है और इनमें से अधिकांश मौसमी नदियाँ हैं। राज्य की प्रमुख नदियाँ निम्नलिखित हैं:
• चंबल नदी – यह राजस्थान की एकमात्र सदानीरा नदी है, जो कोटा, सवाई माधोपुर और धौलपुर जिलों से होकर बहती है।
• बनास नदी – यह एक मौसमी नदी है जो पूर्वी राजस्थान में बहती है और चंबल की सहायक नदी है।
• लूनी नदी – पश्चिमी राजस्थान की प्रमुख नदी है, लेकिन यह खारे पानी की नदी होने के कारण सिंचाई के लिए सीमित रूप से उपयोगी है।
• माही और साबरमती नदी – दक्षिणी राजस्थान में प्रवाहित होती हैं और जल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
राज्य की नदियाँ मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर होती हैं और अधिकांश नदियों का प्रवाह क्षेत्र बहुत सीमित है, जिससे वर्ष भर जल की सतत उपलब्धता सुनिश्चित नहीं हो पाती।
3. झीलें एवं जलाशय: राजस्थान में प्राकृतिक और कृत्रिम झीलें जल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। हालाँकि, इनकी जलग्रहण क्षमता सीमित है और कई झीलों में जलभराव मौसमी होता है। कुछ प्रमुख झीलें और जलाशय निम्नलिखित हैं:
• पिछोला और फतेहसागर झील (उदयपुर) – ये झीलें उदयपुर की जल आपूर्ति का प्रमुख स्रोत हैं और पर्यटन स्थल के रूप में भी महत्वपूर्ण हैं।
• अन्नासागर झील (अजमेर) – यह झील पेयजल आपूर्ति और भूजल पुनर्भरण में सहायक है।
• कायलाना झील (जोधपुर) – यह जोधपुर शहर की जल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन जल संग्रहण क्षमता सीमित है।
• सांभर झील – यह राजस्थान की सबसे बड़ी खारी पानी की झील है, जिसका उपयोग नमक उत्पादन के लिए किया जाता है।
राज्य में कई बड़े जलाशय भी बनाए गए हैं, जैसे जयसमंद, बिसलपुर और माही बजाज सागर, जो पेयजल और सिंचाई के प्रमुख स्रोत हैं।
4. वर्षा जल: राजस्थान में औसत वार्षिक वर्षा अत्यंत असमान रूप से वितरित होती है। पश्चिमी राजस्थान में जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 100 मिमी से भी कम होती है, वहीं पूर्वी राजस्थान में यह 800 मिमी तक पहुँच जाती है। राज्य में वर्षा जल संचयन की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है, जिसमें जोहड़, नाड़ी, बावड़ी और टांका जैसी पारंपरिक संरचनाएँ प्रमुख भूमिका निभाती थीं। हालाँकि, इन पारंपरिक जल संरचनाओं का संरक्षण न होने के कारण वर्षा जल संचयन की क्षमता सीमित हो गई है।
जलवायु परिवर्तन और अनियमित मानसून के कारण वर्षा जल की उपलब्धता और भी अस्थिर हो गई है, जिससे राजस्थान में सूखे की आवृत्ति बढ़ गई है। इस स्थिति से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन को पुनर्जीवित करना आवश्यक है ताकि वर्षा जल को संग्रहित कर भूजल पुनर्भरण किया जा सके और जल संकट को कम किया जा सके।
राजस्थान में जल संसाधनों की स्थिति अत्यधिक चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। भूजल स्तर की गिरावट, नदियों और झीलों में जल की सीमित उपलब्धता, और वर्षा जल के असमान वितरण के कारण राज्य में जल संकट लगातार गहराता जा रहा है। यदि पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनरोद्धार किया जाए और आधुनिक जल संरक्षण तकनीकों को अपनाया जाए, तो इस संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए भूजल प्रबंधन, जल पुनर्भरण, और सतत जल उपयोग जैसी रणनीतियों को अपनाना अनिवार्य होगा।
राजस्थान में जल संकट की प्रमुख समस्याएँ
राजस्थान में जल संकट कई कारकों के कारण लगातार गंभीर होता जा रहा है। जल संसाधनों की सीमित उपलब्धता, अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन, और जनसंख्या वृद्धि इस संकट को और भी जटिल बना रहे हैं। राज्य के विभिन्न हिस्सों में जल संकट की समस्याएँ अलग-अलग रूपों में देखी जाती हैं, जिनमें अल्प वर्षा, भूजल स्तर में गिरावट, जल गुणवत्ता की खराब स्थिति, और पारंपरिक जल संचयन प्रणालियों का लुप्त होना शामिल हैं। इन समस्याओं को समझना और उनके समाधान हेतु प्रयास करना अत्यंत आवश्यक है।
1. अल्प वर्षा एवं अनियमित मानसून: राजस्थान का अधिकांश भाग शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु क्षेत्र में आता है, जहाँ वार्षिक वर्षा अत्यंत कम और असमान होती है। पश्चिमी राजस्थान में जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 100 मिमी से भी कम होती है, वहीं पूर्वी राजस्थान में यह 800 मिमी तक पहुँचती है। मानसून की अनिश्चितता और असमान वितरण के कारण जल संचयन की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित होती है, जिससे भूजल पुनर्भरण की दर धीमी बनी रहती है। वर्षा जल का उचित संचयन न होने के कारण बड़ी मात्रा में पानी व्यर्थ बहकर निकल जाता है, जिससे सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
2. भूजल का अत्यधिक दोहन: राजस्थान में कृषि, शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है। अधिक सिंचाई के लिए बोरवेल की संख्या में वृद्धि के कारण कई जिलों में भूजल स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका है। कई स्थानों पर भूजल स्तर इतना नीचे चला गया है कि पुनर्भरण की संभावना अत्यंत सीमित हो गई है। जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, और अजमेर जैसे शहरी क्षेत्रों में पीने के पानी की माँग को पूरा करने के लिए भूजल का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जिससे जल संकट और भी गंभीर हो गया है।
3. मरुस्थलीकरण और जल संकट: राजस्थान के पश्चिमी भाग में मरुस्थलीकरण की समस्या जल संकट को और अधिक गंभीर बना रही है। मरुस्थलीकरण के कारण मिट्टी की नमी तेजी से कम होती जा रही है और भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। जैसलमेर, बाड़मेर, और बीकानेर जिलों में रेगिस्तानी विस्तार और वनस्पति आवरण की कमी के कारण जल संसाधनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए वनारोपण, वर्षा जल संचयन, और जल संरक्षण तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता है।
4. नदियों का सीमित प्रवाह और असमान जल वितरण: राजस्थान में बहने वाली अधिकांश नदियाँ मौसमी हैं, जिनमें जल प्रवाह वर्षा पर निर्भर करता है।
• चंबल नदी – यह राज्य की एकमात्र सदानीरा नदी है, लेकिन इसका प्रवाह केवल कोटा, सवाई माधोपुर और धौलपुर जैसे कुछ जिलों तक ही सीमित है।
• बनास, लूनी, माही और साबरमती नदियाँ – ये मौसमी नदियाँ हैं, जो वर्षा के आधार पर जल आपूर्ति करती हैं। पश्चिमी राजस्थान में नदियों की अनुपस्थिति जल संकट को और बढ़ाती है।
• नदियों के सीमित प्रवाह और जल वितरण में असमानता के कारण राज्य के कई जिलों में पेयजल और सिंचाई की समस्याएँ बनी रहती हैं।
5. जल गुणवत्ता की समस्या: राजस्थान के कई हिस्सों में भूजल और सतही जल की गुणवत्ता खराब होती जा रही है।
• फ्लोराइड और आर्सेनिक की अधिकता – राज्य के कई जिलों में भूजल में फ्लोराइड और आर्सेनिक की अधिकता पाई जाती है, जिससे हड्डी और दाँत की बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
• लवणता की समस्या – पश्चिमी राजस्थान में लवणता और खारे पानी की समस्या आम है, जिससे पेयजल और सिंचाई के लिए जल की उपयोगिता सीमित हो जाती है।
• औद्योगिक प्रदूषण – कई औद्योगिक क्षेत्रों में अनुपचारित अपशिष्ट जल का नदियों और भूजल स्रोतों में प्रवाह जल प्रदूषण को बढ़ा रहा है।
6. पारंपरिक जल संचयन प्रणालियों का क्षय: राजस्थान में प्राचीन काल से जल संचयन की समृद्ध परंपरा रही है, जिसमें जोहड़, नाड़ी, बावड़ी, टांका, और कुंड जैसी संरचनाएँ शामिल थीं। लेकिन आधुनिक तकनीकों और पाइपलाइन आधारित जल आपूर्ति प्रणालियों के चलते इन परंपरागत संरचनाओं का क्षय हो गया है।
• जोहड़ और नाड़ी जैसी संरचनाओं का संरक्षण और पुनर्निर्माण न होने के कारण वर्षा जल का संचयन नहीं हो पाता, जिससे भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया बाधित होती है।
• नई जल संचयन प्रणालियों का व्यापक स्तर पर विकास नहीं हुआ है, जिससे जल संरक्षण की संभावनाएँ सीमित हो गई हैं।
7. बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण: राजस्थान में तेजी से बढ़ती जनसंख्या और बढ़ते शहरीकरण के कारण जल संकट और भी विकट होता जा रहा है।
• शहरी क्षेत्रों में जल की अधिक माँग – जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, और कोटा जैसे शहरों में जल की माँग तेजी से बढ़ी है, जिससे भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है।
• औद्योगिक विस्तार – औद्योगिक गतिविधियों के बढ़ने से जल की खपत में वृद्धि हुई है और जल स्रोतों पर अधिक दबाव पड़ा है।
• असंयमित जल उपयोग – घरेलू और औद्योगिक क्षेत्रों में जल की बर्बादी की प्रवृत्ति जल संकट को और अधिक बढ़ा रही है।
राजस्थान में जल संकट की समस्याएँ बहुआयामी हैं और इन्हें हल करने के लिए बहुस्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है। जल संसाधनों के असमान वितरण, भूजल स्तर में गिरावट, जलवायु परिवर्तन, और बढ़ती जनसंख्या जैसे कारकों ने जल संकट को और गंभीर बना दिया है। इन समस्याओं के समाधान के लिए भूजल प्रबंधन, सतत जल उपयोग, जल संचयन प्रणालियों का पुनर्जीवन, और जल संरक्षण की आधुनिक तकनीकों को अपनाना आवश्यक होगा। जल संकट से निपटने के लिए सरकार, समाज और स्थानीय समुदायों को मिलकर सतत प्रयास करने की आवश्यकता है, जिससे राजस्थान में जल संसाधनों का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
राजस्थान में जल संकट से निपटने के सुझाव
राजस्थान में जल संकट की विकट स्थिति को देखते हुए इसके समाधान के लिए दीर्घकालिक और प्रभावी नीतियों को अपनाना आवश्यक है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, आधुनिक तकनीकों का उपयोग, और समुदाय की भागीदारी जल संकट से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। राज्य में जल संरक्षण और सतत उपयोग के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
1. वर्षा जल संचयन को बढ़ावा: राजस्थान में वर्षा जल संचयन की पारंपरिक पद्धतियाँ प्राचीन काल से ही कारगर रही हैं। वर्तमान में इनका पुनरुद्धार और नए तरीकों का विकास आवश्यक है।
• कुंड, टांका, जोहड़, और बावड़ियों का पुनरुद्धार किया जाए, जिससे वर्षा जल का अधिकतम संचयन किया जा सके।
• घरों, विद्यालयों और सरकारी भवनों में वर्षा जल संचयन प्रणाली को अनिवार्य किया जाए, जिससे शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जल उपलब्धता बढ़ सके।
• बड़े पैमाने पर चेक डैम और परकोलेशन टैंक का निर्माण किया जाए ताकि वर्षा जल को संरक्षित कर भूजल स्तर को बनाए रखा जा सके।
2. भूजल पुनर्भरण तकनीकों का विकास: राजस्थान में भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया धीमी होने के कारण भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इस स्थिति को सुधारने के लिए आधुनिक और पारंपरिक तकनीकों का मिश्रण आवश्यक है।
• कृत्रिम भूजल पुनर्भरण परियोजनाओं को बढ़ावा देकर अधिक जल को भूमि के अंदर प्रवाहित किया जाए।
• नदियों, तालाबों और झीलों के किनारे पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण किया जाए, जिससे जल संरक्षण में वृद्धि हो।
• बंजर भूमि और मरुस्थलीय क्षेत्रों में जल पुनर्भरण गड्ढों को विकसित किया जाए, ताकि अधिकतम जल भूमि में संचित किया जा सके।
Keywords
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Citation
राजस्थान में जल संकट समस्याएं एवं सुझाव का भौगोलिक अवलोकन. PREM SHANKAR KIRAR. 2025. IJIRCT, Volume 11, Issue 2. Pages 1-7. https://www.ijirct.org/viewPaper.php?paperId=2503113