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2503112

 

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1-6

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मौर्य कालीन एवं गुप्तकालीन नीतियों का ऐतिहासिक विश्लेषण

Authors

Pankaj Kumar Shukla

Abstract

भारतीय इतिहास में मौर्य और गुप्त साम्राज्य दो ऐसे महत्त्वपूर्ण शासकीय युग रहे हैं, जिन्होंने भारत के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया। इन दोनों साम्राज्यों ने न केवल तत्कालीन भारतीय उपमहाद्वीप की शासन प्रणाली को सुदृढ़ किया, बल्कि आर्थिक नीतियों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों पर भी प्रभाव डाला। मौर्य साम्राज्य (321 ईसा पूर्व - 185 ईसा पूर्व) एक अत्यधिक केंद्रीकृत सत्ता थी, जहाँ अर्थव्यवस्था का अधिकांश भाग राज्य के नियंत्रण में था। यह काल बड़े पैमाने पर कृषि उत्पादन, व्यापारिक मार्गों के विस्तार और कर-व्यवस्था की कठोरता के लिए जाना जाता है। सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और उनके सलाहकार चाणक्य (कौटिल्य) ने एक सुव्यवस्थित शासन प्रणाली की स्थापना की, जिसमें आर्थिक नीतियों को राज्य के दीर्घकालिक हितों के अनुरूप ढाला गया।
दूसरी ओर, गुप्त साम्राज्य (लगभग 319 ईस्वी - 550 ईस्वी) ने विकेंद्रीकृत शासन प्रणाली को अपनाया और आर्थिक गतिविधियों को अधिक स्वतंत्रता प्रदान की। इस अवधि को भारत का "स्वर्ण युग" कहा जाता है, क्योंकि इस काल में व्यापार और उद्योग में उल्लेखनीय उन्नति हुई। गुप्त शासकों ने राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण को सीमित रखते हुए व्यापारियों, कारीगरों और कृषकों को अधिक स्वतंत्रता दी। इस नीति का परिणाम यह हुआ कि व्यापारिक गतिविधियों ने व्यापक रूप से विस्तार किया और अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक संबंध सुदृढ़ हुए।
इस शोध पत्र का उद्देश्य मौर्य और गुप्त साम्राज्य की आर्थिक नीतियों का तुलनात्मक अध्ययन करना है। यह अध्ययन इस दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है कि किस शासनकाल में आर्थिक विकास की संभावनाएँ अधिक थीं और किस नीति का दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा। इस शोध के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया जाएगा कि किस प्रकार की नीतियाँ कृषि, व्यापार और कर-व्यवस्था पर प्रभावी रही हैं तथा उन्होंने किस हद तक सामाजिक और आर्थिक समृद्धि को प्रोत्साहित किया। यह शोध न केवल प्राचीन भारत की आर्थिक प्रणाली को समझने में सहायता करेगा, बल्कि आधुनिक आर्थिक व्यवस्थाओं के अध्ययन के लिए भी एक ऐतिहासिक संदर्भ प्रदान करेगा।
मौर्य साम्राज्य में अर्थव्यवस्था का संचालन एक मजबूत और केंद्रीकृत प्रशासन के तहत किया जाता था। अर्थशास्त्र के लेखक कौटिल्य (चाणक्य) ने राज्य की आर्थिक नीतियों को विस्तारपूर्वक वर्णित किया है। उनके अनुसार, अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कृषि, कर-व्यवस्था, व्यापार और शिल्प-कौशल पर विशेष ध्यान दिया गया। मौर्य शासकों ने अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न प्रकार की संस्थाओं और अधिकारियों की नियुक्ति की, जिससे प्रशासनिक दक्षता और आर्थिक स्थिरता बनी रही।
1. कृषि व्यवस्था
मौर्यकाल में कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती थी। कृषि को अधिक उत्पादक बनाने के लिए राज्य ने सक्रिय भूमिका निभाई। भूमि का स्वामित्व मुख्य रूप से राज्य के पास था, जो किसानों को भूमि प्रदान करता था और उनसे कर वसूलता था।
• सिंचाई व्यवस्था को उन्नत करने के लिए नहरों, तालाबों और जलाशयों का निर्माण कराया गया। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए कई नहरों का निर्माण किया गया था।
• किसानों को कृषि में संलग्न रहने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था, और राज्य ने कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा दिया।
• कृषि कर (भाग) लिया जाता था, जो उत्पादन का लगभग एक-चौथाई या एक-तिहाई होता था। यह कर किसानों के लिए एक निश्चित आर्थिक दायित्व था, जिसे वे उपज के रूप में राज्य को प्रदान करते थे।
• कुछ स्थानों पर राज्य कृषि का प्रत्यक्ष संचालन करता था, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां राज्य के लिए राजस्व अर्जन का विशेष महत्त्व था।
2. कर-व्यवस्था
मौर्य प्रशासन कर-संग्रह में कठोर था और राज्य की आर्थिक शक्ति को बनाए रखने के लिए विभिन्न प्रकार के कर लगाए जाते थे।
• भूमि कर (भू-भाग) सबसे महत्वपूर्ण कर था, जो कृषि उपज का एक प्रमुख हिस्सा होता था।
• व्यापार कर, जल कर, खनन कर और अन्य उत्पादन करों के माध्यम से भी राज्य राजस्व अर्जित करता था।
• मौर्य साम्राज्य में कर संग्रह का कार्य सुव्यवस्थित था, और इसके लिए विशिष्ट अधिकारी नियुक्त किए गए थे। यह सुनिश्चित किया जाता था कि कर संग्रहण में कोई अनियमितता न हो।
• व्यापारिक मार्गों पर भी कर लगाए जाते थे, जिससे वाणिज्यिक गतिविधियों पर राज्य का नियंत्रण बना रहता था।
• कर-व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि राज्य के खजाने में पर्याप्त धन हो, जिससे प्रशासनिक और सैन्य गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाया जा सके।
3. व्यापार और उद्योग
मौर्यकालीन व्यापारिक गतिविधियाँ अत्यंत विकसित थीं और घरेलू तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार दोनों का विस्तार किया गया था।
• व्यापार की व्यापकता मुख्य रूप से सड़कों और जलमार्गों के विस्तृत नेटवर्क के कारण थी। राज्य द्वारा निर्मित सड़कों और राजमार्गों से व्यापार सुगम हुआ।
• तक्षशिला और पाटलिपुत्र जैसे नगर व्यापार के प्रमुख केंद्र थे, जहाँ से व्यापारिक गतिविधियों का संचालन किया जाता था।
• व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित बनाने के लिए सैनिकों की तैनाती की गई थी, जिससे व्यापारिक कारवाँ निर्बाध रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान तक यात्रा कर सकें।
• विदेशी व्यापार भी उन्नत था, जिसमें भारत से सोना, चांदी, हाथीदांत, वस्त्र, मसाले और धातु के उत्पादों का निर्यात किया जाता था।
• रोम, चीन, और मध्य एशिया के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित थे, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती थी।
4. श्रम और उद्योग
मौर्यकालीन शासन में श्रमिकों और कारीगरों को विशेष संरक्षण दिया जाता था।
• विभिन्न उद्योगों को बढ़ावा दिया गया, जिनमें वस्त्र निर्माण, धातु-कला, मूर्तिकला और शिल्प-कौशल शामिल थे।
• शस्त्र निर्माण और धातु उद्योग अत्यंत उन्नत अवस्था में थे, जिससे सैन्य शक्ति को मजबूत किया जाता था।
• शिल्पकारों और कारीगरों के लिए अलग-अलग श्रेणियाँ बनाई गई थीं और उनके अधिकारों तथा दायित्वों को सुनिश्चित करने के लिए राज्य द्वारा नियम बनाए गए थे।
• विशिष्ट शिल्प और उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए राज्य ने विशेष संस्थाएँ स्थापित की थीं, जो उत्पादन की गुणवत्ता और दक्षता को बनाए रखने में सहायक थीं।
मौर्यकालीन आर्थिक नीतियाँ अत्यधिक संगठित और सुव्यवस्थित थीं, जिनका मुख्य उद्देश्य राज्य को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और समाज के विभिन्न वर्गों को नियंत्रित करना था। इन नीतियों के माध्यम से कृषि, व्यापार और उद्योग को विस्तार मिला, जिससे मौर्य साम्राज्य की आर्थिक स्थिति अत्यंत समृद्ध हो गई।
गुप्तकालीन शासन प्रणाली आर्थिक दृष्टि से अधिक उदार और विकेंद्रीकृत थी, जिससे व्यापार, कृषि और उद्योग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इस काल को भारतीय इतिहास का "स्वर्ण युग" कहा जाता है, क्योंकि इस दौरान समृद्धि और आर्थिक स्थिरता अपने चरम पर थी। गुप्त शासकों की आर्थिक नीतियाँ व्यापार और उद्योग को बढ़ावा देने के साथ-साथ कृषि उत्पादन में वृद्धि करने पर केंद्रित थीं। राज्य ने प्रशासनिक नियंत्रण को अपेक्षाकृत नरम रखा, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को स्वतंत्र रूप से विकसित होने का अवसर मिला।
1. कृषि व्यवस्था
गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था का आधार मुख्य रूप से कृषि थी, लेकिन इस काल में कृषि पर राज्य का नियंत्रण मौर्यकाल की तुलना में कम था। कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए कई सुधार किए गए और किसानों को अधिक स्वायत्तता दी गई।
• इस काल में व्यक्तिगत भूमि स्वामित्व की अवधारणा विकसित हुई, जिसके तहत किसान स्वयं अपनी भूमि के मालिक हो सकते थे। इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई और किसान अधिक उत्साहित हुए।
• सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए कुओं, नहरों और तालाबों का निर्माण किया गया, जिससे कृषि की निर्भरता केवल वर्षा पर न रहकर कृत्रिम सिंचाई पर भी आ गई।
• कुछ क्षेत्रों में कृषि संबंधी नवाचार देखने को मिले, जिससे फसल उत्पादन में वृद्धि हुई।
• चावल, गेहूं, जौ, गन्ना और फल-फूलों की खेती प्रचलित थी, जिससे आंतरिक व्यापार को भी बल मिला।
• कुछ अभिलेखों से ज्ञात होता है कि बड़े भूमि स्वामियों (महासंधियों) ने अपने खेतों की रक्षा और उत्पादन की देखरेख के लिए श्रमिकों और दासों को नियुक्त किया था।
• कर व्यवस्था अधिक उदार थी, जिससे किसानों को राहत मिली और उनकी क्रयशक्ति में वृद्धि हुई।
2. कर-व्यवस्था
गुप्त शासकों ने कर-प्रणाली को सरल और लचीला बनाया, जिससे लोगों पर कर का अत्यधिक बोझ न पड़े और आर्थिक गतिविधियाँ सुचारू रूप से चलती रहें।
• भूमि कर (भू-भाग) मुख्य कर था, लेकिन इसकी दर अपेक्षाकृत कम थी, जिससे किसानों को अधिक स्वतंत्रता मिली।
• व्यापार पर लगने वाले कर कम किए गए, जिससे व्यापारिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला और विदेशी व्यापार को बढ़ावा मिला।
• मंदिरों और ब्राह्मणों को कर-मुक्त भूमि अनुदान देने की परंपरा विकसित हुई, जिससे राज्य का प्रत्यक्ष आर्थिक नियंत्रण कुछ हद तक कमजोर हुआ।
• स्थानीय प्रशासन द्वारा कई क्षेत्रों में कर संग्रहण किया जाता था, जिससे विकेंद्रीकरण को बढ़ावा मिला।
• दस्तकारी और शिल्पकारों पर कुछ व्यावसायिक कर लगाए गए, लेकिन उनकी दरें कम थीं, जिससे वे अधिक उत्पादन कर सकते थे।
3. व्यापार और उद्योग
गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था में व्यापार और उद्योग का अत्यधिक विकास हुआ। इस काल में आंतरिक और विदेशी व्यापार दोनों का विस्तार हुआ, जिससे राज्य को आर्थिक रूप से समृद्धि प्राप्त हुई।
• समुद्री व्यापार अत्यधिक विकसित हुआ और दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन तथा रोमन साम्राज्य के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित हुए।
• भारत से रेशम, कांच, धातु उत्पाद, हाथीदांत, मसाले, सुगंधित तेल और वस्त्रों का निर्यात किया जाता था, जबकि चीन और रोम से सोना, चांदी और बहुमूल्य पत्थरों का आयात होता था।
• गुप्तकालीन सिक्कों की उच्च गुणवत्ता के कारण भारतीय मुद्रा का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में महत्त्वपूर्ण स्थान था। सोने की मुद्रा (दीनार) और चांदी के सिक्के व्यापारिक लेन-देन में प्रयुक्त होते थे।
• प्रमुख व्यापारिक केंद्र पाटलिपुत्र, उज्जयिनी, कांचीपुरम और मथुरा थे, जहाँ से व्यापारियों के कारवाँ देश-विदेश के लिए रवाना होते थे।
• व्यापार मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापारियों और कारवाँ के लिए विशेष संरक्षा नीतियाँ अपनाई गईं।
• गुप्त शासकों ने व्यापारिक गतिविधियों को सुगम बनाने के लिए नए मार्गों और पुलों का निर्माण करवाया।
4. श्रम और उद्योग
गुप्तकाल में शिल्प और उद्योगों में अत्यधिक उन्नति हुई। इस काल में कारीगरों और श्रमिकों को विशेष संरक्षण प्राप्त था, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा में वृद्धि हुई।
• धातु-कला विशेष रूप से उन्नत थी। सोने, चांदी, तांबे और लोहे से बनी मूर्तियाँ, आभूषण, और हथियार उच्च स्तर के होते थे।
• वस्त्र उद्योग विकसित हुआ, और रेशमी तथा सूती वस्त्रों का निर्यात बड़े पैमाने पर किया जाने लगा।
• मृद्भांड (मिट्टी के बर्तन) निर्माण में प्रगति हुई और विभिन्न प्रकार के सुशोभित तथा उपयोगी बर्तन बनाए जाने लगे।
• व्यापारिक और औद्योगिक गिल्ड (श्रेणियाँ) अधिक संगठित हो गईं। ये गिल्ड व्यापारियों और कारीगरों के अधिकारों की रक्षा करती थीं और उनके उत्पादन एवं मूल्य निर्धारण में सहयोग प्रदान करती थीं।
• श्रमिकों और कारीगरों की स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए विशेष नियम बनाए गए, जिससे श्रमिक शोषण को रोका जा सके और वे अधिक दक्षता से कार्य कर सकें।

गुप्तकालीन आर्थिक नीतियों का प्रभाव
गुप्तकालीन आर्थिक नीतियों का दीर्घकालिक प्रभाव भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर पड़ा। इन नीतियों के कारण:
• कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई और किसान अधिक स्वतंत्र हुए।
• व्यापारिक गतिविधियाँ सुगम हुईं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की अर्थव्यवस्था का महत्त्व बढ़ा।
• धातु-कला, वस्त्र उद्योग और अन्य शिल्प कौशल को प्रोत्साहन मिला, जिससे कारीगरों और श्रमिकों की स्थिति में सुधार हुआ।
• गुप्त साम्राज्य में स्वर्ण मुद्राओं का प्रचलन बढ़ा, जिससे व्यापार और आर्थिक लेन-देन अधिक सुगम हुआ।
• विकेंद्रीकृत प्रशासन और उदार आर्थिक नीतियों के कारण समाज के विभिन्न वर्गों को लाभ हुआ, जिससे समग्र आर्थिक विकास संभव हुआ।
इस प्रकार, गुप्तकालीन आर्थिक नीतियाँ भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वर्ण युग की नींव बनीं, जिन्होंने भारत को व्यापार, कृषि और शिल्प-कौशल के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित किया।
तुलनात्मक अध्ययन
विषय मौर्यकालीन आर्थिक नीतियाँ गुप्तकालीन आर्थिक नीतियाँ
शासन प्रणाली केंद्रीकृत विकेंद्रीकृत
कृषि व्यवस्था राज्य के नियंत्रण में, भूमि कर अधिक निजी भूमि स्वामित्व, सिंचाई साधनों में सुधार
कर-व्यवस्था कठोर कर प्रणाली, अधिक राजस्व संग्रह कम कर प्रणाली, व्यापार और कृषि को प्रोत्साहन
व्यापार और उद्योग राज्य नियंत्रण, स्थलीय व्यापार अधिक मुक्त व्यापार, समुद्री व्यापार का विस्तार
श्रम और गिल्ड प्रणाली राज्य का कठोर नियंत्रण व्यापारिक गिल्डों का अधिक विकास
सामाजिक प्रभाव किसानों और श्रमिकों पर उच्च कर बोझ व्यापारियों और कारीगरों की उन्नति


निष्कर्ष
मौर्य और गुप्त साम्राज्य की आर्थिक नीतियों की तुलना करने पर यह स्पष्ट होता है कि दोनों कालों में आर्थिक व्यवस्थाएँ भिन्न थीं, लेकिन प्रत्येक काल ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। मौर्यकालीन आर्थिक नीतियाँ अत्यधिक केंद्रीकृत थीं, जिनमें राज्य का कृषि, व्यापार, और उद्योग पर व्यापक नियंत्रण था। अशोक के शासनकाल में विशेष रूप से राज्य द्वारा बुनियादी ढाँचे के विकास, जल-संरचनाओं की स्थापना और व्यापार मार्गों के विस्तार पर बल दिया गया। कर-संग्रह की सख्त प्रणाली और राज्य द्वारा नियंत्रित उद्योगों ने अर्थव्यवस्था को संगठित बनाए रखा, जिससे राजस्व की स्थिरता सुनिश्चित हुई।
इसके विपरीत, गुप्त काल की आर्थिक नीतियाँ अपेक्षाकृत उदार और विकेंद्रीकृत थीं। इस काल में व्यापारिक श्रेणियों (गिल्ड) की भूमिका अधिक प्रभावी हुई, जिससे निजी व्यापार और उद्योग को प्रोत्साहन मिला। भूमि कर यद्यपि मुख्य राजस्व स्रोत बना रहा, लेकिन व्यापार और शिल्प-कला को अधिक स्वतंत्रता मिलने से आर्थिक गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। गुप्त शासकों ने समुद्री व्यापार को बढ़ावा दिया, जिससे दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन और रोम तक व्यापारिक संबंध विस्तृत हुए।
दोनों साम्राज्यों ने अपने-अपने समय में आर्थिक समृद्धि के नए प्रतिमान स्थापित किए। मौर्य शासन ने संगठित प्रशासनिक ढाँचा विकसित किया, जिससे व्यापारिक मार्गों, राजकीय उद्योगों और कृषि व्यवस्था को मजबूती मिली। वहीं, गुप्त शासन ने व्यापारिक और औद्योगिक स्वतंत्रता को प्रोत्साहन देकर भारतीय अर्थव्यवस्था को एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार केंद्र के रूप में उभरने का अवसर दिया। अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मौर्य शासन ने आर्थिक विकास को सख्त प्रशासनिक नियंत्रण के माध्यम से सुनिश्चित करने का प्रयास किया, जबकि गुप्त शासन में व्यापार और उद्योग की स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी गई, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था अधिक गतिशील और समृद्ध बनी।

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Keywords

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Citation

मौर्य कालीन एवं गुप्तकालीन नीतियों का ऐतिहासिक विश्लेषण. Pankaj Kumar Shukla. 2025. IJIRCT, Volume 11, Issue 2. Pages 1-6. https://www.ijirct.org/viewPaper.php?paperId=2503112

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